नदी का प्रवाह हूँ
किसी का हार हूँ
नेह भरा अभिसार हूँ
मैं किसी का प्यार हूँ ।
एक प्रेम पगा गीत हूँ
किसी का मनमीत हूँ
धड़कती धड़कन हूँ मैं
ह्रदय में बसा स्पंदन हूँ ।
गेसुओं की छावं हूँ
रेशम का गावं हूँ
घनेरी घटा बन छा जाऊं
सपनों की ठावं हूँ ।
काजल की धार हूँ
प्रीत की पतवार हूँ
ख़ुशी से जाते हैं छलक
मैं किसी की आन हूँ ।
एक जुगनू हूँ
कंगन की खनखन हूँ
तारों भरी रात हूँ
मैं तेरा श्रृंगार हूँ ।
लाज का पानी हूँ
दिल की रवानी हूँ
लबों पर न आये कभी
मैं ऐसी कहानी हूँ .
Wednesday, July 14, 2010
Sunday, July 11, 2010
एक नजर भर
एक गुलाबी मुस्कान
खिलती है
तुम्हारे होठों पर
और ठहर जाती है
गालों पर
अबीर की
एक पतली परत।
कोई भी बात
तुम कहते हो यूँ ही
और मन के आँगन में
फिरती है
तुम्हारी स्मृति की
रंगीन तितली।
एक हल्का-सी छुअन
हो जाती है तुमसे
और मोगरा
खिल उठता है
दिल की स्निग्ध क्यारी में।
एक पल के लिए
दिखता है तुम्हारा चेहरा
और पलकों की तलहटी में
देर तक लहराता है
मुस्कुराता चाँद।
एक नजर भर
देखते हो तुम
और देह के सितार में
तरंगित होती है
प्यार की रागिनी।
खिलती है
तुम्हारे होठों पर
और ठहर जाती है
गालों पर
अबीर की
एक पतली परत।
कोई भी बात
तुम कहते हो यूँ ही
और मन के आँगन में
फिरती है
तुम्हारी स्मृति की
रंगीन तितली।
एक हल्का-सी छुअन
हो जाती है तुमसे
और मोगरा
खिल उठता है
दिल की स्निग्ध क्यारी में।
एक पल के लिए
दिखता है तुम्हारा चेहरा
और पलकों की तलहटी में
देर तक लहराता है
मुस्कुराता चाँद।
एक नजर भर
देखते हो तुम
और देह के सितार में
तरंगित होती है
प्यार की रागिनी।
Thursday, July 8, 2010
पहला बादल
आकाश में पहला बादल
चातक करता था इन्तजार
बदरा चले गए बिन बरसे
प्यासा ही रह गया बेकरार ।
मानसून की बूँद न आई
धरती रह गई प्यासी सी
मेघ न आये बहार न आई
बहे गरम हवा बौराई सी ।
पवन खुश्क नहीं रही नमी
नम थी जो मेरी आँखें
पत्तों में काई की कमी
उड़ने को आतुर मेरी पांखें ।
क्यों सूना है दालान मेरा
ये घन दल क्यों लौट गए
चातक ने भी छोड़ दी आस
क्या प्रिय मेरे हैं रूठ गए ।
कौन सुने हिया की हाय
जीवन में नहीं जान यहाँ
किसको दें उलाहना यह
तुम बिन अटके हैं प्राण यहाँ ।
चातक करता था इन्तजार
बदरा चले गए बिन बरसे
प्यासा ही रह गया बेकरार ।
मानसून की बूँद न आई
धरती रह गई प्यासी सी
मेघ न आये बहार न आई
बहे गरम हवा बौराई सी ।
पवन खुश्क नहीं रही नमी
नम थी जो मेरी आँखें
पत्तों में काई की कमी
उड़ने को आतुर मेरी पांखें ।
क्यों सूना है दालान मेरा
ये घन दल क्यों लौट गए
चातक ने भी छोड़ दी आस
क्या प्रिय मेरे हैं रूठ गए ।
कौन सुने हिया की हाय
जीवन में नहीं जान यहाँ
किसको दें उलाहना यह
तुम बिन अटके हैं प्राण यहाँ ।
तुम्हारा नशा
बीता बसंत वर्षा आने को है
तुम्हारा नशा ना जाने को है ।
जो गुलाबी स्मित ओढ़ आयी हो तुम
मोहकता मुझ पर छा जाने को है
बेखबर तुम हलचलों से दुनिया की
काजल कोई तुम्हारा चुराने को है ।
हर रंग समा जाना चाहता है तुममें
इन्द्रधनुष भी नभ से उतर आने को है ।
इन्तजार तुम्हारा रहता है हर पल
तुम्हारे बिन धड़कन रुक जाने को है ।
लगा लो इक बार ह्रदय से प्रिये
समय का ये पल ठहर जाने को है ।
तुम्हारा नशा ना जाने को है ।
जो गुलाबी स्मित ओढ़ आयी हो तुम
मोहकता मुझ पर छा जाने को है
बेखबर तुम हलचलों से दुनिया की
काजल कोई तुम्हारा चुराने को है ।
हर रंग समा जाना चाहता है तुममें
इन्द्रधनुष भी नभ से उतर आने को है ।
इन्तजार तुम्हारा रहता है हर पल
तुम्हारे बिन धड़कन रुक जाने को है ।
लगा लो इक बार ह्रदय से प्रिये
समय का ये पल ठहर जाने को है ।
Tuesday, July 6, 2010
किताब
किताब के पन्नों को
पलटते हुए ये ख्याल आया
यूं पलट जाए जिन्दगी
सोचकर रोमांच हो आया ।
ख्वाबों में जो बसते हैं
सम्मुख आ जाएँ तो क्या हो
किताबें सपने बेच रहीं हैं
हकीकत हो जाए तो क्या हो ।
उनका अक्स साथ लेकर
आँख है खुलती दिन ढलता
पलकें भारी होने से लेकर
रात ढले फिर दिन खुलता ।
हर पन्ने से प्यार मुझे
हर हरफ लगे उपहार मुझे
जो रहते हैं संग संग
चाहूं देना सब राग रंग ।
पढ़ना चाहूं मैं ऐसे
साँस समाई हो जैसे
हर पन्ना बने प्रेम अनुबंध
फूल और खुश्बू का सम्बन्ध ।
पलटते हुए ये ख्याल आया
यूं पलट जाए जिन्दगी
सोचकर रोमांच हो आया ।
ख्वाबों में जो बसते हैं
सम्मुख आ जाएँ तो क्या हो
किताबें सपने बेच रहीं हैं
हकीकत हो जाए तो क्या हो ।
उनका अक्स साथ लेकर
आँख है खुलती दिन ढलता
पलकें भारी होने से लेकर
रात ढले फिर दिन खुलता ।
हर पन्ने से प्यार मुझे
हर हरफ लगे उपहार मुझे
जो रहते हैं संग संग
चाहूं देना सब राग रंग ।
पढ़ना चाहूं मैं ऐसे
साँस समाई हो जैसे
हर पन्ना बने प्रेम अनुबंध
फूल और खुश्बू का सम्बन्ध ।
Sunday, July 4, 2010
इनमें भरा है जीवन
तुम्हारी आँखें
जैसे समाया है उसमें
सूर्य
और झिर झिर झलकती हैं
रश्मियाँ
इनमें भरी है
जीवन की
ज्योति
जगमग करती है
जैसे प्रकृति की हो
दामिनियाँ
ये पनीले नयन
बसता है इनमें
सुकून
मेरा बसेरा है
सपने करते है जहाँ
सरगोशियाँ
तुम्हारा मन
छलकता है नेह जिनमें
है समंदर
लहरें करती हैं जहाँ
अठखेलियाँ
तुम्हारा सान्निध्य
शीतलता भरी है जिसमें
है घनी छाँव
जहाँ खिलखिलाती हैं
चाँदनियाँ ।
जैसे समाया है उसमें
सूर्य
और झिर झिर झलकती हैं
रश्मियाँ
इनमें भरी है
जीवन की
ज्योति
जगमग करती है
जैसे प्रकृति की हो
दामिनियाँ
ये पनीले नयन
बसता है इनमें
सुकून
मेरा बसेरा है
सपने करते है जहाँ
सरगोशियाँ
तुम्हारा मन
छलकता है नेह जिनमें
है समंदर
लहरें करती हैं जहाँ
अठखेलियाँ
तुम्हारा सान्निध्य
शीतलता भरी है जिसमें
है घनी छाँव
जहाँ खिलखिलाती हैं
चाँदनियाँ ।
Friday, July 2, 2010
तुम्हारे होने से
अनंत इच्छाएं बन
कोपल
उग आती हैं
ह्रदय धरातल पर
जब तुम्हारी
मुस्कान
मेरे दिल में उतर जाती है ।
सैंकड़ों सुसुप्त स्वपन
सुगबुगाने लगते हैं
जब
तुम्हारी स्नेहिल चितवन
मेरी आँखों में तैर जाती है ।
असीम चाहतें
सिमट
आना चाहती हैं
जब तुमसे मिलने
की घड़ी करीब आती है ।
भीने भीने से भाव
मोगरा बन
महकने लगते हैं
जब तपती सांसें
तुम्हें छूकर वापस आती हैं ।
कोपल
उग आती हैं
ह्रदय धरातल पर
जब तुम्हारी
मुस्कान
मेरे दिल में उतर जाती है ।
सैंकड़ों सुसुप्त स्वपन
सुगबुगाने लगते हैं
जब
तुम्हारी स्नेहिल चितवन
मेरी आँखों में तैर जाती है ।
असीम चाहतें
सिमट
आना चाहती हैं
जब तुमसे मिलने
की घड़ी करीब आती है ।
भीने भीने से भाव
मोगरा बन
महकने लगते हैं
जब तपती सांसें
तुम्हें छूकर वापस आती हैं ।
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