Monday, November 15, 2010

नजर उठा बस तक लेना

होगा जब मधुमास प्रहर
मलय बावरी इतराएगी
डोलेगी  सिहर सिहर
प्रेम संदेशा लाएगी .

सपनो के लगा के पंख
चाँद से मिलने जायेगी
चाँद उतर आए धरा पर
चंदनिया पैर पखारेगी .

झिलमिल रंगीन सितारे
डोला लेकर आयेंगे
चंदा सूरज बने कहार
पटरानी को ले जायेंगे .

उतावले मेरी बांह हिंडोले
तुम्हें आठों पहर झुलाएंगे
थक जाएँ जब नैन परिंदे
सपनों  में उन्हें सुलायेंगें .

आओगे प्रिय जिस राह से
मुझे जरा बतला देना
राह बुहार दूं पलकों से
नजर उठा बस तक लेना .

Sunday, November 14, 2010

लौट जाओ तुम अपने नीड़

अधरों का तनिक  विस्तार 
करती  विस्तृत  दुनिया उसकी
एक हंसी की पतली  रेखा
भर देती  झोली उसकी .

एक झलक पाने को बस
सदियों तक रखते धीर
चंदा सूरज तारे पूछे
किसके लिए  रहो  अधीर  .

पलक कहे नैनों में भर लूं
ह्रदय समाना चाहे आह में
बाहें कहती कंठं लगा लूं
कदम जाए ठिठक  राह में .

मलिनता देखी जो मुख पर
सब ओर छा जाए अंधकार
ज्योतिपुंज  ले आऊं  धरा पर
जगमग का हो जाए अधिकार .

सपनों का मेरे पता  पूछते
धरा से लेकर अम्बर तक
खोज में उनकी रहे जूझते
जाऊं उन्हें  लाने  पाताल तक . 

स्मृतियाँ मेरी उन्हें रूलाती
हर लेती हैं दिल का चैन
प्रीत की मैना उन्हें सताती
जाग जाग कर काटे  रैन .

लौट जाओ तुम अपने  नीड़
पाषाण  ह्रदय पर रख लूं मैं
छुपा न ले दुनिया की भीड़
भावों में अपने भर लूं मैं .

Wednesday, November 10, 2010

लक्ष्य नहीं मैं

व्यक्तित्व में मेरे
थोडा गुरुत्व
करता आकृष्ट
तुम्हारा प्रभुत्व .

निजता मेरी
लगे भली
तुमको देती
कुछ खलबली .

शब्द मेरे
थोड़े साधारण
लगते तुमको
अति असाधारण .

सपने मेरे
आँखों में तुम्हारी
प्रश्न तेरे
भरते हैं खुमारी .

पलकें मेरी
आस सजाये
होगी पूरी
दिन कब आये .

भाव मेरे
लगते अनदेखे
मन के चितेरे
रहते बिनदेखे .

मेरा मोहपाश
तुमको बांधे
लक्ष्य नहीं मैं
बढ़ जाओ आगे .

Monday, November 8, 2010

आंसू



बहुत भारहीन हो तुम
जरा खुश हुए
कि छलक आते हो तुम
थोडा दिल दुखा नहीं
कि समंदर ले आते हो .




लगता है मीठा
ख़ुशी के अतिरेक में
यह खारा पानी
लाख छिपाना चाहो
बह ही जाता है .

कीमत भी भिन्न
भिन्न भिन्न
स्थितियों में
प्रिया के आंसू
मोतियों से भी मंहगे
माँ के आँसू
अनमोल
आंकी नहीं जा सकती
जिसकी कीमत

गरीब के आंसू
बेमोल
नहीं जिसकी
कोई कीमत
बहते है लावारिसं
और स्वयं सूख भी जाते है
नहीं बढाता कोई हाथ
उसे पोंछने को
देने को दिलासा

कभी निर्णायक
भी बन जाते है ये
पुख्ता साक्ष्य भी है
सच और झूठ का
निर्णय टिका होता है
कभी कभी इन पर
ये तो उन आँखों
पर निर्भर है
जिनमें बसते हैं
ये आंसू

कभी हंसाते है
कभी रुलाते है ये
काबू पाना इन पर
नहीं आसान
छलकाना इनको
भी नहीं आसान
छिपाना भी है
बहुत मुश्किल

आंसुओं 
तुम्हें तुम्हारी कसम
कभी न आना
मेरे प्रिय के
नैनो में
बदल लेना राह
उन लाल डोरों से
जिनमें बसते हैं हम .

Wednesday, November 3, 2010

इस दिवाली तुम आना





























इस दिवाली तुम आना


चमकता ध्रुवतारा बनकर


मेरे झरोखे टिक जाना


एक सबल आशा बनकर .






इस दिवाली तुम आना


नीलकमल फूल बनकर


शीश देवों के अर्पित होना


मेरी आराधना बनकर .






इस दिवाली तुम आना


सूर्यमुखी सा तेज लिए


बिन देखे न कुम्हलाना


सूर्योदय की आस लिए .






इस दिवाली तुम आना


भावों का कुंड बनकर


मन का सारा तम हरना


अलौकिक एक दीप बनकर .






इस दिवाली तुम आना


मेरी प्यारी मैना बनकर


मीठे बोल सुना जाना


मधुमास की रैना बनकर .






इस दिवाली तुम आना


मोगरे की कली बनकर


तन मन महका जाना


जूडे की वेणी बनकर .






इस दिवाली तुम आना


सुंदर सी कविता बनकर


सारा द्वेष तिरोहित करना


निर्मल सी सरिता बनकर .






इस दिवाली तुम आना


सखा मेरे मीत बनकर


जीवन दीप्त मेरा करना


जादुई दीपक बनकर .

Tuesday, November 2, 2010

परिवर्तन

महुवा था गिरता
मेरे दालान ओसारे
खुशबू था फैलाता
आँगन और चौबारे .

पौ फटने के साथ
पनघट पर जाना
सखियों से मिलना
बतियाँ भर लाना .

पूरब की लाली
चमकाती बाली
रंभाती गइयां
हांकती मईया .

अन्न और दलहन
कहलाता था गल्ला
छोटी खुशियों से
हँसता था मोहल्ला .

आंसू या मुस्कान
सब होते थे साझे
जरा छलक जाए
सब रहते थे आगे .

कहाँ गए वो
दिन सीधे सादे
सूरज था फीका
बिंदिया के आगे .

आया ये कैसा
परिवर्तन है
अदृश्य  हुआ
सब आकर्षण है .

चाँद और तारे
सब हैं यथावत
धरती की धुरी
गति से समागत .

कहाँ खो गया
वो अमृत कलश
गजानन एरावत
कामधेनु की झलक .

रिक्त हो चला
मनु तेरा संसार
भाव  बिन फीका
श्रद्धा का अभिसार .

रंगों की एक तूलिका
फेर दो मुझ पर कभी
खिल उठे कोई कलिका
गुनगुना उठे भ्रमर तभी.

Monday, November 1, 2010

तय नहीं था जो

सूरज था अपने यौवन पर
बिखरी अभी थी लालिमा
घन दल आये उस पर
छा गई घोर कालिमा .

बसंत था कुछ अलसाया
थी बहारें भी बहकी हुई
कौन राह से पतझड़ आया
बगिया सारी सुनसान हुई .

आशा थी पुष्प आया
नया सा मेरे उपवन में
बैरी अंधड़ बन आया
वीरानी दे गया चेतन में .

बेमौसम की ये बरसात
बहा ले गई मन का गाँव 
दूर कर दिया अपनों से
रहा नहीं कोई अपना ठाव .

चंदा था बहुत गुमान किए
चांदनी संग करता अठखेली
मैं तेजस घट साथ लिए
रूपस न तुम मुझसे अलबेली .

कैसे बदला मीत मेरा
जीवन हो गया रसहीन
तय नहीं था जो गया गुजर
कैसे रहना होगा तुम बिन .