भोर हुई सूरज आया
पर उसमें वह ताप कहाँ
नव जीवन का संदेसा लाया
चली गई वह आब कहाँ
निकली गौरैया नीड़ से अपने
किसके आँगन जाऊं मैं
मेरा ओसारा सूना पड़ा
किसको गीत सुनाऊँ मैं
आया एक कबूतर जोड़ा
सोचा कुछ दाना चुग लूं
देखा पसरा था सन्नाटा
कहा कि उनकी सुधि ले लूं
धूप गुलाबी का एक टुकड़ा
छनकर आता खिड़की से
आज खड़ा है चौखट थामे
क्या जाऊं अन्दर झिडकी से
निस्तब्ध खड़ी दीवार घडी
समय न काटे कटता है
जीवन चक्र रूका हो जैसे
जरा भी नहीं सरकता है
क्यारी में जो खिला है टुह टुह
नहीं रही रंगत उसकी
किसकी वेणी में ठहरूं
व्यर्थ जिन्दगी है मेरी
ह्रदय करता है क्रन्दन
गए कहाँ मेरे रघुराई
गया संग मेरा स्पंदन
लौटा लाओ जग जिय जाई
रुनझुन में पड़ जाए प्राण
पुरवाई जीवनदायिनी हो
नाचे मोर पपीहा चहके
प्रिय क़ी चली पालकी हो .



