जिद तुम्हारी
संसार को बताऊँ
इच्छा मेरी
मन ही में छिपाऊँ
चाहो तुम
बरस बरस जाऊं
मैं चाहूं
सीप में मोती बसाऊँ
कहो तुम
हर पल सजाऊँ
मैं कहती
दर्पण छिपाऊँ
मांगों तुम
बिछ बिछ जाऊं
मेरा सपना
माथे सजाऊँ
मंशा तुम्हारी
बलिहारी जाऊं
मन कहता
मैं वारी जाऊं
तुम चाहो
अलकों से उलझना
मैं चाहूं
उलझन से निकलना
लाना चाहो
चाँद हथेली
मैं न बूझूं
ये अबूझ पहेली .




