Friday, April 8, 2011

नूतन




सब ओर छाया 
नवीन उल्लास 
ऋतुराज ने किया 
कोई परिहास 

आम में मंजर
कटहल में फूल
धरा चाहे बंजर 
हरीतिमा रही झूल
पायल की रुनझुन
गोरी के पाँव
गाये गीत गुनगुन 
पीपल की  छाँव  

धीमे सुर में
कोयल गाती  
मीठे स्वर में 
ताप हर जाती 

नई उमंग 
प्रीत है नई 
मन में तरंग 
आशाएं कई 

ह्रदय हुलसी 
सपनों की लड़ी
आँगन तुलसी 
जोडती कड़ी 

पतझड़ हारा 
आई नव कोपल 
परिवेश सारा 
नूतन कोमल . 

Wednesday, April 6, 2011

मेरे पथ





जननी जनक हुए विव्हल 
आँगन में गूंजी किलकारी 
माँ की ममता हुई विकल 
सुख की भर दी पिचकारी 

कच्ची मिटटी से गढ़ दी 
एक सलोनी मूरत सी 
आशाओं की गठरी रख दी 
दिखती सूरत मेरी सी 

रोती यदि वे रो देते 
मैं हंसती वो खुश होते 
जरा मलिनता मुख आते   
वे अपना आपा  खोते 

देख मुझे आँखें भरते 
आह मेरी सब हर लेते 
स्वप्न सभी मुझमें तिरते 
साहस और संबल देते 

पंखों ने आज उड़ान भरी 
सपनो ने गति पाई है 
उम्मीदों को उनकी परी
सम्मुख लेकर आई है 

मेरे पथ मुझे राह दिखा 
चिंता सब  हर लूं उनकी 
विधना का हो कोई लिखा 
पुष्प सजाऊँ चाह में उनकी . 

Monday, April 4, 2011

प्रतीक्षा



क्यों इतनी बैचैनी लाती
प्रतीक्षा की निर्मम घड़ियाँ
चाहने से भी टूट न पाती
अनुराग भरी निर्मल लड़ियाँ   


क्या होती है एक  परीक्षा 
धीर भरे आकुल मन की 
या कि है कोई पैमाना 
माप सके ऊँचाई प्रेम की 


क्या इसमें श्रद्धा गहरी 
चिन्ता का सैलाब भरा
कुशल से होंगे मीत मेरे 
अँखियाँ चाहे देखूं जरा 

क्यों इसमें दूरी ज्यादा 
पल लगते युग जैसे 
लेकिन जब वो आ जाते 
समय लगाये पंख जैसे 

क्या होता है मौका एक
चिंतन मनन समीक्षा का
कहाँ कमी है चूक देख 
करूँ सुधार अपेक्षा का  

कितना विद्यमान है सार
रहकर दूर भी पास लगे
बरसों बरस हो जाएँ पार 
कल ही की तो बात लगे

अवलंबन की कड़ियाँ लम्बी 
दिन दूनी  बढती जाएँ 
प्रतीक्षा जितनी भी दम्भी  
आस में उम्र गुजर जाए .    

Thursday, March 31, 2011

लघु जीवन







ओस की बूँद 
बहुत निर्मल 
गिरती जिस पर
करती पावन 

फूलों पर 
मोती बिखराती 
पत्तों पर भी 
रूप सजाती 

आँख खुले 
पलकों सजती 
प्रकृति में 
शीतलता भरती 

बांह पसारे  
ह्रदय लगाती 
कल फिर आऊंगी  
कानों में कहती

नभ से गिरती 
और फिसलती 
नव दिन की 
आशा भरती 

स्वयं कहती 
एक कहानी 
आना मिटना 
जीवन की रवानी 

क्षणभंगुर है 
अपना  उपवन 
मधुमय करता 
इसका लघु जीवन   .

Tuesday, March 29, 2011

तुम्हारे गीत के बोल











एक सुगंध
छोड़ गई हो तुम
जो बसी है
मेरे ह्रदय में
और प्रेरणा बन
सुबासित कर रही है
मेरा तन 
मन भी 


एक छवि 
भूल आई हो तुम 
मेरे ओसारे 
स्थापित है 
आँगन मेरे 
तुलसी की तरह 
सात्विक कर रही है 
मेरा घर 
द्वार भी 

एक दीया
दीप्त कर आई हो 
मेरे मंदिर में 
अभिमंत्रित कर 
प्रज्ज्वलित है  
सदभावना की तरह 
उसकी लौ 
मेरे अन्दर 
बाहर भी 

एक एहसास 
छोड़ आई हो 
हर कोने में 
भरा भरा सा है 
हर कोना 
सान्निध्य की तरह
जीवंत  है 
तुम्हारी उपस्थिति 
प्रत्येक  पल
हर  क्षण 

एक गीत 
गुनगुना आई हो 
मेरे जीवन में 
संगीत बज उठा है 
हर साज पर 
झंकृत है 
मन का हर तार 
तुम्हारे गीत के बोल 
सदैव गुनगुनाती हैं
मेरी आँखें  
अधर भी . 

Monday, March 28, 2011

नींद तुम्हारी



आँखों में हो  
किसे बसाये 
नींद को जो 
न आई नींद. 

सपना है  या 
कोई हकीकत 
जिसने चुराई 
तुम्हारी नींद 

नजरों में उनको 
भर लेते 
आँखों ही से 
कुछ कह देते 

नींद बावरी 
रही भटकती 
बांहों में तनिक 
भर लेते 

रात रह गई 
संग तुम्हारे 
भर दी खुमारी 
अंग तुम्हारे 

उसने सुन ली 
दिल की धड़कन
बढ़ गई है 
उसकी उलझन 

करवट बदल 
यह सोच रही 
किस ओर चलूँ  
पथ खोज रही 

नींद तुम्हारी 
मीठी मीठी 
आएगी फिर 
सपने लेकर

करना उसका 
इन्तजार 
आँखों में भरना 
बार बार .   

Thursday, March 24, 2011

बूँद भर ख़ुशी







बूँद भर ख़ुशी 
लौटाती है प्राण
निस्तेज देह  में 
शरशैया से 

बूँद भर ख़ुशी 
भर देती है उजास 
जब आती है 
तुम्हारी कुशल  

बूँद भर ख़ुशी 
ले आती है उल्लास 
जब नियत होता है दिन
तुम्हारे आने का 

बूँद भर ख़ुशी 
हर लेती है संताप 
जब करता हूँ कुछ 
 मैं तुम्हारे लिए

बूँद भर ख़ुशी 
भर देती है सपने 
जब हौले से कहती हो 
चाँद निकल आया 

बूँद भर ख़ुशी 
पास ले आती है लक्ष्य  
जब आता  हूँ मैं
तुम्हारे पद चिन्हों पर

बूँद भर ख़ुशी 
भर देती है उमंग 
जब देखता हूँ मैं 
तुम्हें मुस्कुराते हुए 

बूँद भर ख़ुशी 
भर देती  हर घाव 
जब करता हूँ महसूस 
तुम्हारा स्निग्ध सान्निध्य  .