काजल की कोठरी
जन्मस्थली है मेरी
धरती और आसमान
मेरा घर संसार
अमावस को माना
पूर्णिमा शरद की
काले कटोरों में
थी सुधा सपनों की
पूरे हुए कुछ
कुछ को किनारा
डूबे कुछ मझधार
कईयों का वारा न्यारा
बैठें है आस में कई
आये कोई उबार ले
प्रतीक्षा में आँख भींचे
कोई तो संवार दे
कुछ से तो
की बड़ी मनुहार
ना खोलो पलक
जाओगे खुद को हार
माने ना ये खुदगर्ज
दामन छुड़ा लिया
जाने को दूर हमसे
उनको बुला लिया
दिखाओ ना सूरज इन्हें
सह नहीं पायेंगे
पंख झुलस जो गए
फिर उड़ ना पायेंगे .






