Sunday, May 15, 2011

तुम जो नहीं हो पास














एक खालीपन 
पसर गया है 
मन के भीतर 
बाहर भी
तुम जो नहीं हो पास 

उदासी के घन 
घिर आये हैं 
अँधेरा फैला है 
चारों ओर 
सूरज तुम 
छिप गए हो उसकी ओट 

वैराग्य सा 
समाता जा रहा है
आत्मा में 
विरक्ति आसीन 
हो रही है
वसंत तुम 
कब आओगे लेकर आसक्ति 

मोह सा 
बढ़ता जा रहा है 
जीवन से 
इन्द्रियां सभी 
अनियंत्रित हो रही हैं 
विवेक तुम 
कहाँ हो चुराकर चेतना.

19 comments:

  1. उत्तम...भावपूर्ण...

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  2. मन का खालीपन संसार का सुख भी नहीं भर सकता है।

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  3. मोह सा
    बढ़ता जा रहा है
    जीवन से
    इन्द्रियां सभी
    अनियंत्रित हो रही हैं
    विवेक तुम
    कहाँ हो चुराकर चेतना.
    Kya gazab kee rachana hai!

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  4. वैराग्य सा
    समाता जा रहा है
    आत्मा में
    विरक्ति आसीन
    हो रही है
    वसंत तुम
    कब आओगे लेकर आसक्ति ... akelapan asahya hai , tum aao to

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  5. वैराग्य सा
    समाता जा रहा है
    आत्मा में
    विरक्ति आसीन
    हो रही है
    वसंत तुम
    कब आओगे लेकर आसक्ति

    खूबसूरत भावों से सजी सुन्दर रचना

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  6. वैराग्य सा
    समाता जा रहा है
    आत्मा में
    विरक्ति आसीन
    हो रही है
    वसंत तुम
    कब आओगे लेकर आसक्ति


    विवेक और वैराग्य के द्वन्द का सटीक चित्रण.

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  7. kab aaoge tum!!:)
    sach me aana hi hoga..!!

    hamare blog pe aayen!

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  8. मोह सा
    बढ़ता जा रहा है
    जीवन से
    इन्द्रियां सभी
    अनियंत्रित हो रही हैं
    विवेक तुम
    कहाँ हो चुराकर चेतना.

    utam ati utam

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  9. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 17 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  10. मोह और वैराग्य का अंतर्द्वन्द

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  11. मोह सा
    बढ़ता जा रहा है
    जीवन से
    इन्द्रियां सभी
    अनियंत्रित हो रही हैं
    प्रेम में चेतना नही रहती ... बहुत ही अच्छा लिखा है ...

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  12. मोह सा
    बढ़ता जा रहा है
    जीवन से
    इन्द्रियां सभी
    अनियंत्रित हो रही हैं
    प्रेम में चेतना नही रहती .



    अंतर की व्यथा को उजागर करती हुई रचना बहुत ही सुंदर लगी. आभार.

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  13. अत्युत्तम प्रभावशाली अभिव्यक्ति ! आमंत्रण में एक आग्रहपूर्ण कशिश है ! बहुत सुन्दर रचना ! बधाई एवं शुभकामनायें !

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  14. वाह !कितनी अच्छी रचना लिखी है आपने..! बहुत ही पसंद आई

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  15. व्यथा नि:शब्द कर गयी .....

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  16. मोह सा
    बढ़ता जा रहा है
    जीवन से
    इन्द्रियां सभी
    अनियंत्रित हो रही हैं
    प्रेम में चेतना नही रहती

    सुन्दर रचना.बधाई

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  17. बहुत ही गुढ़ बात कही है आपने आज..बढ़िया।

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  18. एक अद्भुद कविता है यह... चेतना का अनियंत्रित होना बढ़िया विम्ब है... इस प्रेम गीत के लिए शुभकामना... प्रतीक्षा है और भी कविताओं की....

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