Tuesday, October 11, 2011

गया संग मेरा स्पंदन























भोर हुई सूरज आया
पर उसमें वह ताप कहाँ
नव जीवन का संदेसा लाया 
चली गई वह आब कहाँ 

निकली गौरैया नीड़ से अपने 
किसके आँगन जाऊं मैं 
मेरा ओसारा सूना पड़ा 
किसको गीत सुनाऊँ मैं 

आया एक कबूतर जोड़ा 
सोचा कुछ दाना चुग लूं 
देखा पसरा था सन्नाटा 
कहा कि उनकी सुधि ले लूं 

धूप गुलाबी  का एक टुकड़ा
छनकर आता खिड़की से 
आज खड़ा है चौखट थामे 
क्या जाऊं अन्दर झिडकी से 

निस्तब्ध खड़ी दीवार घडी 
समय न काटे कटता है 
जीवन चक्र रूका हो जैसे 
जरा भी नहीं सरकता है 

क्यारी में जो खिला है टुह टुह  
नहीं रही रंगत उसकी 
किसकी वेणी में ठहरूं 
व्यर्थ जिन्दगी है मेरी 

ह्रदय करता है क्रन्दन 
गए कहाँ मेरे रघुराई 
गया संग मेरा स्पंदन 
लौटा लाओ जग जिय जाई 

रुनझुन में पड़ जाए प्राण 
पुरवाई जीवनदायिनी हो 
नाचे मोर पपीहा चहके 
प्रिय क़ी चली पालकी हो .

14 comments:

  1. बहुत ही खुबसूरत प्रस्तुति ||
    बधाई महोदया ||

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  2. अद्भुत दृश्य उपस्थित किया है।

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  3. बहुत ही भावपूर्ण रचना...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  4. भावपूर्ण और प्राकृतिक उपालम्भों से भरी पड़ी रचना ..

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  5. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  6. सुन्दर प्रयास .... रुचिकर सृजन शुभकामनायें जी /

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  7. लाजवाब प्रस्तुति अद्भुत भाव और शब्द सयोंजन

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