Friday, October 7, 2011

मन की मैना

ऐ !  मेरे मन की मैना 
तनिक जाओ उनके संग 
जब बैठे हों फुर्सत में 
थोडा करना उनको तंग 

नींद न आये जब उनको 
एक मीठा गीत सुना देना 
फिर भी यदि उदासी हो 
निज पंखों से सहला देना 

जब सोये हों कमल सेज 
सिरहाने जाकर रहना 
सपनों का जब पलटे पेज 
मूरत मेरी बनकर रहना 

घुंघुराली अलकें जब मचले 
गालों से उन्हें हटा देना 
नैनों में छाई खुमारी को 
अँखियाँ अपनी में भर लेना 

उजास भोर में उठें अधीर 
तुम समझाना देना धीर 
यदि किसी बात से हों आहत
सब हर लेना उनकी पीर

जाएँ जब अपनी अमराई 
शाखों पर तुम जाना झूल 
कूक कूक कर उन्हें रिझाना 
याद रहे न सब कुछ भूल 

लिखने बैठें जब पाती 
कलम उठाकर लाना तुम 
ज्यों लिखें ढाई आखर 
हया से मर न जाना तुम  . 

13 comments:

  1. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||

    बहुत बहुत बधाई ||

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  2. बहुत बढि़या ...।

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  3. kya kahne hain...bahut pyari si kavita!

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  4. लिखने बैठें जब पाती
    कलम उठाकर लाना तुम
    ज्यों लिखें ढाई आखर
    हया से मर न जाना तुम.

    प्रेम में प्रतीकों के माध्यम से सुंदर संवाद स्थापित करने का प्रयास सार्थक हुआ सुंदर रचना के जन्म के रूप में.

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  5. वाह, काश, मनभावों का संप्रेषण इतना प्रभावी हो जाये।

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  6. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  7. लिखने बैठें जब पाती
    कलम उठाकर लाना तुम
    ज्यों लिखें ढाई आखर
    हया से मर न जाना तुम
    सुन्दर लुभावनी रचना .. प्रतीक जीवंत

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  8. बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

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  9. गहरे भाव।
    सुंदर प्रस्‍तुति।

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  10. वाह! बड़ी प्यारी कविता....
    सादर...

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