Monday, April 11, 2011

दहलीज







ड्योढ़ी  पर खड़ी 
करती हूँ  मनन 
आशाएं जो जुडी 
उनका न हो हनन 

छूटा है जो पीछे 
बाबा का आँगन 
दुलार मुझे खींचे 
बारहमासी फागुन

एक अल्हड मासूम 
सरिता सा जीवन
चिड़िया हुई गुमसुम 
पुकारता है यौवन 

पार हुई देहरी 
छूटेगा माँ का आँचल
बचपन अलबेला 
हो जाएगा अकेला 

बंधेगी डोर जिससे 
चांदनी भरूँगी 
सुख होगा उसीसे 
प्रीत मैं करूंगी 

चौखट नहीं द्वार की 
इस पार है हंसी 
जीवन  दहलीज की
उस पार है ख़ुशी    

रिश्ता खोये नहीं 
मान मनुहार का 
हर पल फले वहीँ 
प्यार विश्वास का . 
 

19 comments:

  1. बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन

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  2. हमेशा की तरह ये पोस्ट भी बेह्तरीन है
    कुछ लाइने दिल के बडे करीब से गुज़र गई....

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  3. मन में आशा की संचार करती
    यौवन से बचपन की और इंगित करती सुन्दर रचना के लिए बधाई!

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  4. उत्साह संचारित करती कविता।

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  5. अच्‍छी कविता ,, बेहतरीन

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  6. रिश्ता खोये नहीं
    मान मनुहार का
    हर पल फले वहीँ
    प्यार विश्वास का .

    रिश्तों की गुत्थियों को सुलझाती भावों से परिपूर्ण अच्छी कविता.

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  7. बंधेगी डोर जिससे
    चांदनी भरूँगी
    सुख होगा उसीसे
    प्रीत मैं करूंगी
    Kitne pyare alfaaz hain!

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  8. neh se bhari ek khoobsurat rachna.

    shubhkamnayen

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  9. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 12 - 04 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  10. बहुत ही बढ़िया ...सुंदर, सजीव, सकारात्मक भाव लिए है आपकी रचना ....

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  11. मन में सुख और आशा का संचार करती सुन्दर रचना ! बहुत खूब !

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  12. बहुत बढ़िया लिखा आपने.रामनवमी की हार्दिक शुभकामनायें.

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  13. bahut sunder sapno, ummeedo ke ehsaso se saji manbhawan rachna..ek dehri se dusri dehri par pair rakhne wali sabhi behno ki aisi kaamnaye poorn ho...yahi dua hai.

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  14. रामपति जी रोबेर्ट फ्रोस्ट की कवितायें पढ़िए आप.. देखेंगी कि आपकी और उनकी कविता की संरचना में बहुत समानता है... जिस विषय पर आपकी कविता है उस से ही मिलते जुलते विषय पर उनकी भी एक कविता है 'THE LOCKLESS DOOR' .. दोनों कविता का रैम पैटर्न " a b a b " का है.. मीटर में भी समानता है.. पूरी कविता पढ़िए...
    THE LOCKLESS DOOR
    It went many years,
    But at last came a knock,
    And I though of the door
    With no lock to lock.

    I blew out the light,
    I tip-toed the floor,
    And raised both hands
    In prayer to the door.

    But the knock came again.
    My window was wide;
    I climbed on the sill
    And descended outside.

    Back over the sill
    I bade a 'Come in'
    To whatever the knock
    At the door may have been.

    So at a knock
    I emptied my cage
    To hide in the world
    And alter with age.

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  15. बंधेगी डोर जिससे
    चांदनी भरूँगी
    सुख होगा उसीसे
    प्रीत मैं करूंगी

    Kya baat hai madam je, bhaut ache likhe hai

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