Monday, April 18, 2011

फिर ना होगा अपना मिलन



 
नेह से तुमने कंठ लगाया
तपता ह्रदय बहुत जुडाया
खुशबू तुम्हारी उर में समाई 
सुप्त स्वपन  ने ली अंगड़ाई .  
 
मन में उठी तरंग हिलोर
भिगो गई सब पोर पोर 
जिव्हा स्तब्ध शब्द खो गए 
सूखा कंठ जड़ हो गए . 
 
नीर का दरिया तोड़े बंध
सूखी धरती हुई  बंजर
दिन बीते जैसे तैसे 
रातें हो जाये खंजर . 
 
थम गया जैसे कालचक्र 
भाग्य दृष्टि ना हो वक्र 
पथराये नैना ना झपके  
भर लूं इनमें जी भरके . 
 
कहाँ रहे प्रिय कौन देस 
तुम्हें हमारी याद ना आई  
तुम बिन कैसे रैना बीते
उन लम्हों की कैसे भरपाई .
 
एक बार जो चित्त बिठाया 
जीवन भर का प्रसाद पाया 
प्यासे नैनों में जो समाया  
पुलकित मन अति हरषाया .
 
परदेस ना जाने देंगे अब
काली घटाओं का बंधन 
छोड़ गए जो अब मितवा
फिर ना होगा अपना मिलन .  
 

11 comments:

  1. बढ़िया रचना लिखी है आपने।
    --
    नेह से तुमने कंठ लगाया
    तपता ह्रदय बहुत जुडाया
    --
    अगर..
    तप्त ह्रदय को बहुत मिलाया..
    कर दें तो...
    बहुत अच्छा लगेगा।

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  2. सुन्दर रचना..

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  3. परदेस ना जाने देंगे अब
    काली घटाओं का बंधन
    छोड़ गए जो अब मितवा
    फिर ना होगा अपना मिलन .
    Komal-si,nazuk-si iltija,jise koyi nazarandaaz na kar sake!

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  4. मन तो अपनों को बाँधकर रखना चाहता है।

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  5. परदेस ना जाने देंगे अब
    काली घटाओं का बंधन
    छोड़ गए जो अब मितवा
    फिर ना होगा अपना मिलन .
    दर्द की इंतहा है। सुंदर भावाभिव्यक्ति।

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  6. परदेस ना जाने देंगे अब
    काली घटाओं का बंधन
    छोड़ गए जो अब मितवा
    फिर ना होगा अपना मिलन .
    ......बिल्‍कुल सच कहती ये पंक्तियां ...भावमय करते शब्‍द ।

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  7. खूबसूरत अभिव्यक्ति

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  8. खूबसूरत अभिव्यक्ति

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  9. नीर का दरिया तोड़े बंध
    सूखी धरती हुई बंजर
    दिन बीते जैसे तैसे
    रातें हो जाये खंजर .

    खूबसूरती से किसी के दिल की व्यथा पेश की है

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