Monday, April 25, 2011

तुम्हारा नाम लेकर







पथ भरा कांटे या धूल  
बढ़ चलूंगी मैं संभल
शूल भी बनेंगे फूल  
चलकर जाउंगी निकल 

मिलेंगे सब राही नये
लक्ष्य भी होगा नया 
साथी सब छूट गए 
मार्ग भी होगा नया 

कैसे बीतेंगे वे पल 
जो न होगे तुम वहां
मुड़कर देखूँगी विकल 
मैं रहूंगी फिर कहाँ 

स्रोत छूटा साहस का
अवलंबन और संबल 
संग पीछे प्रेरणा का 
नैनों में भरे कम्पन 

डगमगाई हूँ मगर 
समझ कुछ आता नहीं 
अनजानी सी एक डगर 
छोर दिखलाता नहीं 

भटक जाऊं यदि कभी 
दीप दिखलाना मुझे 
थक बैठूं यदि वहीँ 
ऊष्मा दे जाना मुझे   

जब कभी अवकाश हो 
स्मृतियों में विचर आना   
जब मुझे अवसाद हो 
सपने कुछ दे जाना 

चल पड़ी हूँ मैं एकल  
राह को पहचान देकर 
भर लिया पग में बल 
तुम्हारा नाम लेकर . 

10 comments:

  1. भटक जाऊं यदि कभी
    दीप दिखलाना मुझे
    थक बैठूं यदि वहीँ
    ऊष्मा दे जाना मुझे

    very nice kya baat kiske liye itne sundar rachna madam jee

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  2. मिलेंगे सब राही नये
    लक्ष्य भी होगा नया
    साथी सब छूट गए
    मार्ग भी होगा नया
    अंतिम बात है, आगे और आगे बढ़ते रहना। सुंदर कविता, प्रेरक भी।

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  3. बहुत उत्तम अभिव्यक्ति!

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  4. गुरुदेव रबिन्द्र नाथ जी का एक गीत आपकी रचना पढ़ कर याद आ गया जिसका हिंदी अनुवाद ये है "यदि आपकी पुकार सुनकर कोई नहीं आता तो अकेले चल पड़िए"
    इस बेहतरीन रचना के लिए बधाई स्वीकारें.

    नीरज

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  5. पथ भरा कांटे या धूल
    बढ़ चलूंगी मैं संभल
    शूल भी बनेंगे फूल
    चलकर जाउंगी निकल
    --
    रचना में शब्द-चयन बहुत बढ़िया है!
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!

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  6. पथ भरा कांटे या धूल
    बढ़ चलूंगी मैं संभल
    शूल भी बनेंगे फूल
    चलकर जाउंगी निकल .

    बहुत सुंदर रचना. एक सरल अभिव्यक्ति एक सरल मन की. रचना में शब्द चयन वाकई में बहुत सुंदर है.

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  7. बहुत खूबसूरती के साथ शब्दों को पिरोया है इन पंक्तिया में आपने...बहुत सुंदर रचना

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  8. यही अथक विश्वास है।

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