Monday, December 13, 2010

धरा

चित्र साभार गूगल 

 
जननी सा विस्तार समाया 
आँचल जैसी छाँव बसी
गुण अवगुण अंग लगाया
ममता हँसे निर्मल हंसी .

दूब नरम  या अड़ा पहाड़
आधार ठोस मैं ही तो हूँ
कलकल नदिया सागर दहाड़
पड़ाव आखिरी मैं ही तो हूँ .

अन्न का दाना कंद मूल
सब जीवों का जीवन सार
हीरा पन्ना मोती मानिक
मुझमें जन्मते लिए आकार .

शांत समंदर है गहराता
अपने भीतर संसार लिए 
ज्वालामुखी लावा गरमाता
थोडा सा कुछ  क्रोध लिए .

मैं सृष्टा मुझसे सृष्टि
है जीवन में हलचल
करूँ दुलार स्नेह  वृष्टि
बढे प्रेम धार पलपल . 

मैं  वसुंधरा धैर्य घना
माता जननी या पालक
देव-मनुज करें वंदना
सब जीवों की परिचालक .
अति उदार करुणा बहती  
अलंकार सब संसाधन
दोहन को ना कहती
हरीतिमा है प्रसाधन  . 

छू लो तुम चाहे  गगन
जमीं पर आना ही होगा
संसार झुका रहो मगन
मुझमें समाना ही होगा .












11 comments:

  1. आपकी सरल अभिव्यक्ति हमेशा मन को भा जाती है

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  2. शब्द जैसे ढ़ल गये हों खुद बखुद, इस तरह कविता रची है आपने।

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  3. छू लो तुम चाहे गगन
    जमीं पर आना ही होगा
    संसार झुका रहो मगन
    मुझमें समाना ही होगा
    उपमाओं से सुसज्जित रचना ,भाषा पर अच्छी पकड़ है | बधाई

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  4. छू लो तुम चाहे गगन
    जमीं पर आना ही होगा
    संसार झुका रहो मगन
    मुझमें समाना ही होगा .


    यही तो शाश्वत सत्य है।

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  5. क्या सजीव चित्रण किया है बधाई एक शाश्वत सत्य को दर्शाती पोस्ट

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  6. मिट्टी से पैदा हुए, मिट्टी में मिल जाना है,
    जीवन जिसको कहते हैं, उसका यही फ़साना है।

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  7. सुन्‍दर भावमय करते शब्‍द ...।

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  8. बेहद भावपूर्ण!

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