Thursday, July 28, 2011

रिमझिम













पावस की बूँदें 
तपन को बढाती
बरस बरस के
लोचन भर जाती 


कोकिल के पंख भीगे 
कैसे भला उड़ पाती 
उलझे हैं मन के धागे 
कैसे उन्हें बुन पाती 

क्षितिज तक निहारे 
घन भर भर छाये 
किसको  वह पुकारे 
जो इन्हें उड़ा ले जाए 

इन कोमल  बूंदों ने 
मन को हुल्साया 
टप टप के गान ने 
स्पंदन भी ठहराया

चली जाओगी बदरी 
बरस के तुम निकल 
आंसुओं की गठरी 
लिए बिरहन रहे विकल 

जग सारा जुडाया  
मुझमें क्यों दाह भरी
पुरवा ने द्वेष उड़ाया
मुझमें है आह भरी 

रिमझिम सी बूँदें 
दरिया उफान लायेंगी 
नाम तुम्हारा गूंजें
स्मृति बहा न पाएंगी . 

9 comments:

  1. यादें कहाँ बिसराई जाती हैं ? सावन की फुहारें यादों को और तारो ताज़ा कर देती हैं ... सुन्दर रचना

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  2. सावन की फुहारों में यादें घुल घुल कर निकल आती हैं।

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  3. रिमझिम सी बूँदें
    दरिया उफान लायेंगी
    नाम तुम्हारा गूंजें
    स्मृति बहा न पाएंगी . ati sundar ........

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  4. vaah ..........bahut hi sundar yadon ka chitran kiya hai.

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  5. सावन की फुहारे और आपकी रचना!
    दोनों को महसूस कर आनन्द आ गया!

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  6. कोकिल के पंख भीगे
    कैसे भला उड़ पाती
    उलझे हैं मन के धागे
    कैसे उन्हें बुन पाती
    बहुत अच्छी रचना क्या कहने ...

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  7. रिमझिम सी बूँदें
    दरिया उफान लायेंगी
    नाम तुम्हारा गूंजें
    स्मृति बहा न पाएंगी .

    सुंदर भाव लिए अच्छी प्रस्तुति.

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  8. सावन की फुहारों का मनमोहक चित्रण ....बहुत सुंदर.....उम्दा अभिव्यक्ति...

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