Monday, June 20, 2011

मरीचिका




मरीचिका के पीछे चलती 
आ पहुँचीं मैं रेगिस्तान 
बिन जीवन के सांसें तपती 
दूर तक फैला है वीरान 

मिले कहीं पानी का सोता 
जीने का अवलम्बन बन 
हारी हिम्मत क्यों रोता 
आँसूं पी जा न कर क्रन्दन 

गरम हवा के सहे थपेड़े 
रेत कहे टिकने न दूं 
हवा बावरी फिरे उड़े 
एक पल भी थमने न दूं 

कैसे उसे नकार सकूं 
प्रारब्ध प्रथम जो है मेरा 
नियति को स्वीकार करूँ 
निर्बल लिखा भाग्य मेरा 

बीहड़ पथ पर चलते जाना
बस इतनी ही मंजिल है 
मंजिल यदि चाहूं पाना 
वह उतनी ही मुश्किल है 

बढती हूँ निपट अकेली 
मरू ही मेरा बसेरा है
हंसती हुई जो मिले चमेली 
समझो आया  नया सवेरा है. 

8 comments:

  1. एकला चलोरे याद आ गया।
    ज़िन्दगी का लक्ष्य निर्धारित हो और दिल में जज़्बा हो तो हर मुश्किल से पार पाकर कदम बढ़ाते जाना है। सकारात्मक सोच लिए एक बेहतरीन कविता।

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  2. उत्साह के हिलोरें लेती कविता।

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  3. बीहड़ पथ पर चलते जाना
    बस इतनी ही मंजिल है
    मंजिल यदि चाहूं पाना
    वह उतनी ही मुश्किल है
    --
    बहुत उम्दा रचना!

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  4. बढती हूँ निपट अकेली
    मरू ही मेरा बसेरा है
    हंसती हुई जो मिले चमेली
    समझो आया नया सवेरा है.

    नया सवेरा लाता सुंदर नवगीत. सकारात्मक सोच लिए एक बेहतरीन प्रस्तुति.

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  5. मंजिल हो कठिन मगर उस तक चल कर जाने का हौसला ज़रूरी है ...
    चलते रहें तो मंजिल मिले ना मिले , क्या ग़म है !

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  6. बीहड़ पथ पर चलते जाना
    बस इतनी ही मंजिल है
    मंजिल यदि चाहूं पाना
    वह उतनी ही मुश्किल है

    manjil pana muskil hai lekin namukin nahi, agar sahi disha mein prayas kiye jaye toh manjil mil hee jate hai

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  7. सकारात्मक सोच लिए एक बेहतरीन प्रस्तुति|

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