Sunday, June 26, 2011

मोती लड़ियाँ






 











घन लाये भर
बूंदों की खेप 
तपते मन पर 
प्रीत का लेप

झूम उठा 
ठूंठ तरूवर 
नजर उठा 
देखे प्रियवर 

सुगबुगा उठी 
एक बंद कली
शोर है कैसा 
गली गली 

वन उपवन 
मोरनी नाचे 
खिला है मन 
मलय भागे 

रिमझिम करती 
आई बदरिया 
ओढ़ के नाचे 
धवल चदरिया 

गौरैया दुबकी 
पंख हैं भीगे 
यादों में डुबकी
उड़ता मन आगे 

मोती लड़ियाँ 
मेरे आँगन 
जुडती कड़ियाँ 
तुमसे साजन . 

10 comments:

  1. भावों की सुन्दर लड़ियाँ खूबसूरत लगीं.

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  2. बहुत सुन्दर.

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  3. मोती जैसे छोटे छोटे शब्द, सौन्दर्य पूर्ण।

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  4. झूम उठा
    ठूंठ तरूवर
    नजर उठा
    देखे प्रियवर
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति बधाई.....

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  5. मौसम खूबसूरत साकार हुआ !

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  6. बहुत सुन्दर रचना!
    इसकी ध्वन्यात्मकता ही रचना का सौन्दर्य है!

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  7. आपकी कवितायें एक अलग ही सौंदर्य लिए होती है. उनमे मिठास और अपना पण होता है. मुझे बहुत प्रभावित करती हैं.
    आभार

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  8. सुगबुगा उठी
    एक बंद कली
    शोर है कैसा
    गली गली
    very nice

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  9. नमस्कार !
    आपकी कवितायें एक अलग ही सौंदर्य में सिमटी होती है.
    जिस में मिठास और अपना पन. जो प्रभाव छोडती है ,
    आभार

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